राजेंद्र नाथ तिवारी
भ्रष्टाचार सर्वस्पर्शी ,सर्व समावेशी होगया है l देश का सुप्रीम कोर्ट संविधान, न्याय और तर्क सबके लिए उत्तरदायी है । सुप्रीम कोर्ट के किसी भी निर्णय को पलटने का अधिकार संसद के पास है । सुप्रीम कोर्ट का कोई भी निर्णय अगर संविधान, न्याय या तर्क समत्त नहीं है तो संसद को पूरा अधिकार है कि वो बिल पास करके उस निर्णय को बदल सकती है ।
संविधान में शक्तियों का संतुलन बनाया गया है । अगर संसद को लगे कि कोई एक या एक से अधिक सुप्रीम कोर्ट के जज निरंकुश या भ्रष्ट या संविधान के विरूद्ध कार्य कर रहे हैं तो संसद के पास ऐसे जजों को हटाने के पूर्ण अधिकार हैं । इस लिए ऐसी कोई संभावना नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट के जज निरंकुश हो जाएंगे, संविधान का अंकुश हमेशा बना रहेगा ।
अगर तर्क के लिए मान भी लिया जाए कि सुप्रीम कोर्ट कोई निर्णय संविधान, न्याय और तर्क के विरूद्ध दे देता है, तो भी कुछ नहीं होगा क्योंकि उन निर्णयों को लागू करने की मशीनरी तो सरकार मुहैया करवाती है, सुप्रीम कोर्ट के पास अपनी कोई मशीनरी नहीं है जिसके माध्यम से सुप्रीम कोर्ट अपना कोई निर्णय लागू कर सके, ईसलिए ऐसी भी कोई संभावना नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट कभी देश में सत्ता पलट दे, हाँ कभी देश की जनता सरकार के विरूद्ध खड़ी हो जाए और वो जनता सुप्रीम कोर्ट को अपने अधिकारों और देश के हितों की रक्षक मान ले तो जरूर सत्ता भी पलट सकती है परन्तु उस मामले में भी सत्ता परिवर्तन में ताकत जनता की होगी सुप्रीम कोर्ट की नहीं, क्योंकि संविधान में सरकार के विभिन्न हिस्सों की शक्तियों और ज़िम्मेदारियों में बढ़िया संतुलन बैठाया गया है ।
बल्कि इसके विपरीत सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर सरकार तटस्थ है । ऐसी स्थिति निश्चित ही भयावह होगी जब सरकार के गलत निर्णयों पर सुप्रीम कोर्ट चुप रहे और सुप्रीम कोर्ट के गलत निर्णयों पर सरकार चुप रहे, ऐसी परिस्थितियों में देश के नागरिकों के हितों का नुकसान होना निश्चित होगा ।
जहाँ तक भ्रष्टाचार की बात है जब तक सरकार के तंत्र में भ्रष्टाचार फैला रहेगा तब तक न्यायपालिका में भी यह बना रहेगा .lयह संभव ही नहीं है कि सरकार में बना रहे और न्यायपालिका को पूर्णतया भ्रष्टाचार मुक्त किया जा सके । हाल ही के दिनों में जो प्रकरण दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश से संबंधित चल रहा है वो इस बात का सबूत है कि उस प्रकरण को दबाने की कोशिश में निश्चित ही सरकार की सहमति थी वरन् कोई कारण नहीं था कि प्रकरण एक सप्ताह तक सामने नहीं आए । प्रकरण समाचार पत्र में छपने के बाद भी जो रफा दफा करने की कोशिशें हुईं वो भी सरकार की सहमति के बिना संभव ही नहीं थीं । भ्रष्टाचार के मामले में जीरो टॉलरेंस की नीति की जो घोषणा सरकार करती है वो सिर्फ विपक्षी नेताओं, दलों और सरकार के छोटे दर्जे के कर्मचारियों और आम नागरिकों तक सीमित है, शासक दल और शासक दल के नेताओं, उच्चाधिकारियों और ताकतवर लोगों के मामले में यह जीरो टॉलरेंस की नीति ढूँढने पर भी कहीं दिखाई नहीं देती है ।
चारित्रिक टिप्पणियां करना और अपनी हंसी हंसारत कराना भी न्यायिक कदाचार ही है.चाहे इलाहाबाद,दिल्ली या मुंबई हाईकोर्ट से संबंधित प्रकरण ही क्यों हो.